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मंगलवार, मार्च 26, 2024
History / June 26, 2023

श्री दाऊजी महाराज के प्रागट्य की कहानी

एक दिन श्री कल्याण-देवजी को ऐसी अनुभूति हुई कि उनका मथुरा तीर्थाटन का आदेश दे रहा है। कुछ समय सोच-विचार में ही बीत गया। परन्तु श्री कल्याण-देवजी के मन से मथुरा तीर्थाटन की बात जी ही नही रही थी। अत: कल्याण देवजी ने मथुरा तीर्थाटन का निश्चय कर घर से प्रस्थान कर दिया श्री गिर्राज परिक्रमा कर के मानसी गंगा में स्नान किया और फिर पहुँचे मथुरा नगरी, यहाँ श्री कल्याण देव जी ने श्री यमुना जी में स्नान किया और दर्शनकर आगे बढ़े और पहुँचे विद्रुमवन जहाँ आज का वर्तमान बल्देव नगर है। यहाँ रात्रि विश्राम किया। सघन वट-वृक्षों की छाया तथा यमुना जी का किनारा ये दोनों स्थितियाँ उनको भा गई। फलत: कुछ दिन यहीं तप करने का निश्चय किया।.

एक दिन अपने नित्य कर्म से निवृत हुये ही थे कि दिव्य हल मूसलधारी भगवान श्री बलराम उनके सम्मुख प्रकट हुये तथा बोले कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, वर माँगो। कल्याण देवजी ने करबद्ध प्रणाम कर निवेदन किया कि प्रभु आपके नित्य दर्शन के अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। अत: आप नित्य मेरे घर विराजें। बलदेवजी ने तथास्तु कहकर स्वीकृति दी और अन्तर्धान हो गये। साथ ही यह भी आदेश किया कि ‘जिस प्रयोजन हेतु मथुरा यात्रा कर रहे हो, वे सभी फल तुम्हें यहीं मिलेंगे, और श्री दाउजी महाराज ने श्री कल्याण देवजी को बताया की, इसी वट-वृक्ष के नीचे मेरी एवं श्री रेवती जी की प्रतिमाएं भूमिस्थ हैं, उनका प्राकट्य करो। अब तो कल्याण-देवजी की व्यग्रता बढ गई और जुट गये भूमि के खोदने में, जिस स्थान का आदेश श्री बलराम, दाऊ जी ने किया था।.

इधर एक और विचित्र आख्यान गोकुल उपस्थित हुआ कि जिस दिन श्री कल्याण-देवजी को साक्षात्कार हुआ उसी पूर्व रात्रि को गोकुल में गोस्वामी गोकुलनाथजी को स्वप्न हुआ कि जो श्यामा गौ (गाय) के बारे में आप चिन्तित हैं वह नित्य दूध मेरी प्रतिमा के ऊपर स्त्रवित कर देती है। जिस ग्वाले को आप दोषी मान रहे हो वो निर्दोष है। मेरी प्रतिमाएं विद्रुमवन में वट-वृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं उनको प्राकट्य कराओ।.

जय दाऊजी महाराज की

यह श्यामा गौ सद्य: प्रसूता होने के बावजूद दूध नहीं देती थी। क्योकि ग्वाला जब सभी गयो को लेकर वन में चराने ले जाता था। तभी ये श्यामा गाय, एक अमुख स्थान पर जा खड़ी हो जाती थी। और श्यामा गाय के थनों से स्वतः दूध उस स्थान पर गिरने लगता था। जहा पर श्री दाउजी और रेवती माया की मुर्तिया भूमिस्थ थी। और गाय के थनों में दूध नही होता था। इसी कारण महाराज श्री को दूध के बारे में ग्वाला के ऊपर सन्देह होता था। प्रभु की आज्ञा से गोस्वामीजी ने उपर्युक्त स्थल पर जाने का निर्णय किया। वहाँ जाकर देखा कि श्री कल्याण देवजी मूर्तियुगल को भूमि से खोदकर निकाल चुके हैं। वहाँ पहुँच नमस्कार अभिवादन के उपरान्त दोनों ने अपने-अपने वृतान्त सुनाये।
और निश्चय किया कि इस घोर जंगल से मूर्तिद्वय को हटाकर क्यों न श्री गोकुल में प्रतिष्ठित किया जाय। कहते हैं कि चौबीस बैल और अनेक व्यक्तियों के द्वारा हटाये जाने पर भी, मूर्तिया टस से मस न हुई और इतना श्रम व्यर्थ गया। हार मानकर सभी यही निश्चय किया गया कि दोनों मूर्तियों को अपने प्राकट्य के स्थान पर ही प्रतिष्ठित कर दिया जाय। अत: जहाँ श्रीकल्याण-देव तपस्या करते थे उसी पर्णकुटी में सर्वप्रथम स्थापना हुई जिसके द्वारा कल्याण देवजी को नित्य घर में निवास करने का दिया गया, वरदान सफल हुआ।

जय रेवती मैया की

यह दिन संयोगत: मार्गशीर्ष मास की पूर्णमासी थी। षोडसोपचार क्रम से वेदाचार के अनुरूप दोनों मूर्तियों की अर्चना की गई तथा सर्वप्रथम श्री ठाकुरजी को खीर का भोग रखा गया, अत: उस दिन से लेकर आज तक प्रतिदिन खीर भोग में अवश्य आती है। गोस्वामी गोकुलनाथजी ने एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार वहन करने का संकल्प लिया तथा पूजा अर्चना का भार श्रीकल्याण-देवजी ने। उस दिन से अद्यावधि कल्याण वंशज ही श्री ठाकुरजी की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। यह दिन मार्ग शीर्ष पूर्णिमा सम्वत् 1638 विक्रम था। एक वर्ष के भीतर पुन: दोनों मूर्तियों को पर्णकुटी से हटाकर श्री गोस्वामी महाराज श्री के नव-निर्मित देवालय में, जो कि सम्पूर्ण सुविधाओं से युक्त था, मार्ग शीर्ष पूर्णिमा संवत 1639 को प्रतिष्ठित कर दिया गया। यह स्थान कहते हैं भगवान बलराम की जन्म-स्थली एवं नित्य क्रीड़ा स्थली है पौराणिक आख्यान के अनुसार यह स्थान नन्द बाबा के अधिकार क्षेत्र में था। यहाँ बाबा की गौ के निवास के लिये बड़े-बड़े खिरक निर्मित थे।

:गोस्वामी गोकुलेश गोविन्दम पांडेय मंदिर सेवायत

।। चौपाई ।।

तू चिंता न कर काहू की तू धर दाऊ को ध्यान । बाबा पे सब छोड़ दे तेरो ध्यान रखे बलराम ।। तेरो ध्यान रखे बलराम लाडले तुम बाबा के । तेरो प्राण बलराम बसे हो सोचो तुमही बाबा कोहू मन नहि लागे बिना हम जैसे सखा ते ।। ओ सुनियो तू बलराम दाऊ दास की अर्जी । प्राण निकले तेरे चरणन आगे तेरी है मर्जी ।। सब भैयन कू दाऊ दास की जय दाऊजी की।

:राकेश पांडेय मंदिर सेवायत

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पुष्टिमार्गय श्री दाऊजी दर्शन

the Dauji Mandir. The temple has stood for over 5000 years since 1535 AD and is one of the oldest temples in the city. The presiding deity of the temple is Lord Balarama, who was the elder sibling of Lord Krishna.

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